बुंदेलखंड का दशहरा

आप सभी को दशहरा की राम राम पहुंचे जूं 🙏

    दशहरा, धर्म का अधर्म पर, सत्य का असत्य पर जीत का प्रतीक दशहरा। सभी जानते है कि आज के दिन ही भगवान श्री राम ने, लंका नरेश रावण का वध किया था पर उन्होंने एक अहंकारी, अधर्मी, अत्याचारी रावण का रावण का वध किया था, इसलिए तो कहते है कि धर्म की, सत्य की जीत का पर्व है ये। उन्होंने महाज्ञानी रावण का वध नहीं किया था, क्योंकि अगर किया होता तो वो लक्ष्मण जी को कभी रावण के पास ज्ञान लेने के लिए नहीं कहते। आज हम रावण इसलिए नहीं जलाते की वो रावण था, हम उसको अधर्म, अत्याचार का प्रतीक मानकर इसलिए जलाते है कि अगर हमारे अंदर भी ऐसा कुछ है तो वो आज इसके साथ ही त्याग दिया जाए और जलकर राख हो जाए।
       सभी जगह दशहरा को मनाने कि अपनी अलग मान्यताएं है। बुंदेलखंड में इसे मनाने की अपनी अलग ही मान्यताएं और अलग ही उल्लास होता है। यहां सिर्फ रावण का दहन करके ही इस पर्व को नहीं मनाया जाता, इसे बड़े प्रेम से मनाया जाता है। तो चलिए देखते है कि आखिर कैसे यहां दशहरा का पर्व मनाया जाता है।
      दशहरा को बुंदेलखंड मे मनाने की कुछ अलग मान्यताएं, अलग परंपराए है। सुबह उठकर नहा धोकर भगवान की पूजा करके रावण दहन होने का इंतज़ार तो करते ही है, पर था लोगो से गले मिलने कि परंपरा भी है।  यहां दशहरा की शुरुआत कुछ अलग ही ढंग से, कुछ शुभ देखकर करने कि परंपरा है। इस दिन मछुआरे एक डिब्बे में पानी में मछली को डालकर लाते है, ओर घर घर जाकर दिखाते है, और गांव के लोग उनको कुछ अंश देते है, जो उनकी आजीविका, उनका अर्जन होता है। हमारे यहां ऐसी मान्यता है कि आज के दिन सुबह सुबह मछली के दर्शन करने से पूरा साल अच्छा जाता है। जब हम घर पर हुआ करते थे तो कई दफा तो ऐसा होता था की सुबह 5 बजे से वो मछली लेकर आ जाते थे और हम अपनी नींद से उठकर, दौड़कर, अपनी आंखों को खुजलाते हुए मछली देखने पहुंच जाते थे और उनके डब्बे में, 1,2, या 5 रुपए हर कोई डाल देता था। 
बुंदेलखंड में दशहरा के दिन नीलकंठ पक्षी को भी देखने की परम्परा है। कहा जाता है, आज के दिन उन्हें देखना बहुत शुभ होता है, उन्हें भगवान का प्रतिनिधि भी माना जाता है। उनके लिए तो एक लोकोक्ति भी बहुत प्रचलित है, जो मेरी दादी अक्सर आज के दिन बोला करती थीं।-
" नीलकंठ तुम नीले रहियो, दूध - भात को भोजन कारियो।
हमाई बात राम से कहियो, राम ना मिलें तो अपने तक रखियो।। "
 फिर शाम को रावण के बाद पूजा करते है, हमारे यहां आज के दिन पान खाने और खिलाने कि भी परंपरा है।
दशहरा के एक दिन पहले से ही लोग बाज़ार से जाकर पान ले आया करते है। और दशहरा के दिन शाम को पूजा मे पान लगाकर, सबसे पहले भगवान को अर्पण करते है। फिर पान और पान का सामान लगाकर तैयार करके बाहर बैठ जाते है। फिर आज के दिन हम एक दूसरे के घर जाते है उनसे गले मिलकर ( जिसे हम दशहरा मिलना कहते है), मिठाईयां खिलाकर, पान भी खिलाते है। पान को समरसता(सामंजस्य, संतुलन, सदैव एक रहने का प्रतीक) के प्रतीक के रूप में खिलाया जाता है। इस दिन हम प्यार के रूप में सबको पान खिलाते है।
  मुझे याद है कि हम दशहरा मे शाम होने का बड़ा बेसब्री से इंतज़ार किया करते थे। हमारे घर पर हम पान की 2 प्लेट (पोटली) लगाया करते थे। एक अंदर के लिए कि कोई अंदर मिलने आया तो उनको खिलाने के लिए और एक बाहर पापा लोगो के पास रखी जाती थी। और हम भी खुश होकर दौड़कर दौड़कर सबके घर जाता करते थे। और बहुत पान खाया करते थे, और जबरन भी पान खिलाए जाते थे।
      हम आज के दिन सिर्फ रावण नहीं जलाते, खुशियां भी आपस में बांटा करते है।।
   दशहरा की राम राम🙏
   Happy Dussehra😊

स्रोत- इंटरनेट, Chalat Musafir Blog

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