"शांता : श्री राम की बहन"
शांता! आखिर कौन है शांता?
नमस्कार! मैं आज शांता के विषय में जानकारी लेकर, आप सभी के सामने प्रस्तुत हूं। तो फिर विलम्ब ना करते हुए शुरू करते है।
बहुत ही कम लोग जानते है कि शांता, भगवान राम की बड़ी बहन थी। वैसे तो इंटरनेट पर कई जगह ये जानकारी मिलती है कि श्री राम की दो बहनें थीं। एक का नाम शांता तो दूजी का नाम कुकबी था। हालांकि कुकबी के बारे में कहीं कुछ खास जानकारी तो प्राप्त नहीं होती है, सिवाय इतने की वो भगवान राम को बहन थी, और काफी विद्वान कार तो इस बात को स्वीकार नहीं करते हैं। तो हम चर्चा करते हैं, शांता के बारे में।
शांता, महाराज दशरथ और महारानी कौशल्या की पुत्री थी और राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न की बड़ी बहन।वह अत्यंत सुन्दर और सुशील कन्या थी। शांता एक बहुत होंनहार कन्या था वो हर क्षेत्र में निपूर्ण थी | उसे युद्ध कला, विज्ञान, साहित्य एवं पाक कला सभी का अनूठा ज्ञान था | अपने युद्ध कौशल से वह सदैव अपने पिता दशरथ को गौरवान्वित कर देती थी | लेकिन उनका लालन पोषण अंगदेश के राजा रोमपद और उनकी पत्नी वर्षिणी ने किया, जो महारानी कौशल्या की बड़ी बहन और राम की मौसी थी।
शांता के विषय में अनेक लोक कथाएं प्रचलन में है -
एक कथा के अनुसार रानी कौशल्या की बहन रानी वर्षिणी संतानहीन थी और इस बात से वह हमेशा दुखी रखती थी। एक बार रानी वर्षिणी और उनके पति रोमपद जो अंगदेश के राजा थे अयोध्या आएं। रानी वर्षिणी का ध्यान बातचीत के दौरान शांता पर पड़ता है, जो बेहद ही शालीन और निपुण अंदाज़ में दिखती है, उन्हें देखकर वर्षिणी कहती है कि उन्हें भी शांता के ही समान सुशील संतान चाहिए। यह सुनते ही राजा दशरथ उन्हें शांता को गोद देने का वचन दे बैठते है। और रघुकुल के विषय में तो हमेशा ही कहा जाता है कि "रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन ना जाई।" और इस संकल्प के चलते, अपने वचन का पालन करते हुए उन्होंने शांता को राजा रोमपाद और रानी वर्षिणी को गोद दे दिया।
एक दूसरी लोककथा के अनुसार-
शांता का जब जन्म हुआ, तब अयोध्या में अकाल पड़ा और 12 वर्षों तक धरती धूल-धूल हो गई। जिससे राजा दशरथ बहुत चिंतित हुए, और चिंतित राजा को सलाह दी गई कि अकाल का कारण आपकी पुत्री शांता ही है। राजा दशरथ ने अकाल को दूर करने के लिए अपनी पुत्री शांता को अंग देश के राजा रोमपद को दान से दिया। राजा रोमपद की पत्नी रानी वर्षिणी रानी कौशल्या की बड़ी बहन थी। अतः शांता का लालन पालन उनके मौसी और मौसाजी के यहां हुआ था। और कहा जाता है कि शांता को दान देने के बाद शांता कभी वापिस अयोध्या नहीं आयी। और राजा दशरथ भी उनको बुलाने से डरते थे कि कहीं फिर से अकाल ना पड़ जाए।
एक अन्य लोक कथा के अनुसार -
कुछ लोग बोलते थे कि राजा दशरथ ने शांता को सिर्फ इसलिए दान दे दिया था, क्योंकि वह लड़की होने के वजह से उनकी उत्तराधिकारी नहीं बन सकती थी।
एक अन्य लोक कथा के अनुसार -
कुछ लोगो का मानना है कि जब शांता का जन्म हुआ तो दुर्भाग्य से वह शारीरिक रूप से कमजोर ( दिव्यंगना) थी। एक बार जब राजा दशरथ और रानी कौशल्या ने ऋषि वशिष्ठ और अन्य ऋषि मुनियों से इस विषय पर परामर्श लिया तो उन्होंने कहा कि यह बाधा उनके समान गोत्र में विवाह करने के कारण हुई है। उन्होंने सुझाव दिया कि इस कन्या को किसी को गोद दे दें तो वह सामान्य हो जाएगी।
राजा दशरथ और रानी कौशल्या ने शांता को निःसंतान दंपति और रानी कौशल्या की बड़ी बहन रानी वर्षिणी और राजा रोमपद को गोद दे दिया। बाद में शांता सामान्य हो गईं और उनकी खूबसूरती बेजोड़ थी। जैसे- जैसे शांता बड़ी होती गई उनकी सुंदरता, बुद्धिमत्ता और वीरता कि किवदंतियां दूर-दूर तक फैल गई और कई लोग शादी के लिए उनका हाथ मांगने आए। लेकिन उन्होंने केवल एक विद्वान और पवित्र व्यक्ति से शादी का संकल्प लिया था।
शांता का विवाह :-
शांता का विवाह महर्षि विभांडक के पुत्र ऋषि ऋंग से हुआ। एक दिन जब विभाण्डक नदी में स्नान कर रहे थे, तब नदी में ही उनका वीर्यपात हो गया। उस जल को एक हिरणी ने पी लिया था जिसके फलस्वरूप ऋंग ऋषि का जन्म हुआ था।
एक बार जब राजा अपनी पुत्री शांता से बातें कर रहे थे तब एक ब्राह्मण, जो इन्द्र देव का भक्त था, अपने क्षेत्र में फसल की पैदावार के लिए मदद लेने के लिए राजा रोमपद के पास गया, तो राजा ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया।इससे नाराज़ होकर ब्राह्मण वापस लौट गया और अपने भक्त की बेइज्जती पर गुस्साए इंद्रदेव ने बारिश नहीं होने दी, जिस वजह से सूखा पड़ गया। तब इस समस्या से निपटने के लिए राजा ऋंग ऋषि के पास पहुंचे और उनकी आज्ञा से एक यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ के बाद भारी वर्षा हुई और अंग देश फिर से हरा भरा हो गया। जनता इतनी खुश हुई कि अंगदेश में जश्न का माहौल बन गया। तभी वर्षिणी और रोमपद ने अपनी गोद ली हुई बेटी शांता का हाथ ऋंग ऋषि को देने का फैसला किया।
जब पुत्र कामेष्ठी यज्ञ के लिए राजा दशरथ ने दिया आमंत्रण
राजा दशरथ और इनकी तीनों रानियां इस बात को लेकर चिंतित रहती थीं कि पुत्र नहीं होने पर उत्तराधिकारी कौन होगा। इनकी चिंता दूर करने के लिए ऋषि वशिष्ठ सलाह देते हैं कि आप अपने दामाद ऋंग ऋषि से पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाएं। इससे पुत्र की प्राप्ति होगी। दशरथ ने उनके मंत्री सुमंत की सलाह पर पुत्रकामेष्ठि यज्ञ में महान ऋषियों को बुलाया। इस यज्ञ में दशरथ ने ऋंग ऋषि को भी बुलाया। ऋंग ऋषि एक पुण्य आत्मा थे तथा जहां वे पांव रखते थे वहां यश होता था। सुमंत ने ऋंग को मुख्य ऋत्विक बनने के लिए कहा। दशरथ ने आयोजन करने का आदेश दिया।
पहले तो ऋंग ऋषि ने यज्ञ करने से इंकार किया लेकिन बाद में शांता के कहने पर ही ऋंग ऋषि राजा दशरथ के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ करने के लिए तैयार हुए थे। लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी, ''मैं अकेला नहीं आ सकता। मैं यज्ञ कराने के लिए सहमत हूं, लेकिन मेरी पत्नी शांता भी मेरे साथ आएगी। वह भी ऋत्विक के रूप में कार्य करेगी।'' राजा दशरथ फिर से इस बात से भयभीत हुए की कहीं फिर से उनके राज्य में अकाल ना पड़ जाए। उन्होंने फिर से ऋषि से आग्रह किया किन्तु उन्होंने अकेले आने से मना कर दिया। राजा दशरथ ने उत्तराधिकारी की चाह में ऋषि और उनकी पत्नी शांता को आमंत्रित किया।
ऋषी श्रृंग और शांता अयोध्या पहुंचे। शांता ने जहां भी पैर रखा, वहां से सूखा गायब हो गया। दशरथ और कौशल्या सोच में पड़ गए कि आखिर यह कौन है? तब उन्होंने कहा कि हे देवी! आप को हैं? तब शांता ने कहा, ''मैं आपकी पुत्री शांता हूं।'' दशरथ और कौशल्या को यह जानकर बहुत खुशी हुई कि वह उनकी पुत्री शांता है।
दशरथ ने दोनों को ससम्मान आसन दिया और उन दोनों की पूजा-आरती की। तब ऋंग ऋषि ने पुत्रकामेष्ठि यज्ञ किया तथा इसी से भगवान राम तथा शांता के अन्य भाईयों का जन्म हुआ।
दुख तो तब हुआ शान्ता को जब कोई भाई मिलने नहीं आया:
कहते हैं कि जीवनभर शांता राह देखती रही अपने भाइयों की कि वे कभी तो उससे मिलने आएंगे, पर कोई नहीं गया उसका हाल-चाल जानने। मर्यादा पुरुषोत्तम भी नहीं, शायद वे भी रामराज्य में अकाल पड़ने से डरते थे।
कहते हैं कि वन जाते समय भगवान राम अपनी बहन के आश्रम के पास से भी गुजरे थे। तनिक रुक जाते और बहन को दर्शन ही दे देते। बिन बुलाए आने को राजी नहीं थी शांता। सती माता की कथा सुन चुकी थी बचपन में, अपने पिता दशरथ से।
जनता के समक्ष शान्ता ने कभी भी किसी को नहीं पता चलने दिया कि वो राजा दशरथ और कौशल्या की पुत्री हैं। यही कारण है कि रामायण या रामचरित मानस में उनका खास उल्लेख नहीं मिलता है।
ऐसा माना जाता है कि ऋंग ऋषि और शांता का वंश ही आगे चलकर सेंगर राजपूत बना। सेंगर राजपूत को ऋंगवंशी राजपूत कहा जाता है।
वो मंदिर, जहां की जाती है शांता की पूजा:
(1) शांता का पहला मंदिर हिमाचल प्रदेश के कुल्लू से करीब 50 किलोमीटर दूर बंजार के बागा में शांता देवी का बड़ा मंदिर भी बना है। जहां उनकी पूजा श्रृंगी ऋषि के साथ की जाती है।
(2) शांता का दूसरा मंदिर कर्नाटक के श्रंगेरी में है। जहां श्रृंगी ऋषि और शांता की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि श्रंगेरी शहर का नाम भी श्रंगी ऋषि के नाम पर ही है। श्रंगी ऋषि का जन्म कर्नाटक के श्रंगेरी में हुआ था।
स्रोत:
Webduniya hindi blog
Abvlive blog
Ujjawal himanchal
Barfani baba blog by vivek sharma
प्राचीन भारतीय धार्मिक कथायें fecebook page
Internet
Jai Shree Ram 🙏
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